‘पॉवरफुल’ नेताओं की पसंद के जिलाध्यक्ष बने सिरदर्द

Aug 13, 2026

- दतिया प्रकरण के बाद भाजपा के अंदरूनी सर्वे ने बढ़ाई नेतृत्व की चिंता

भोपाल । मध्यप्रदेश में सत्ता में होने के बावजूद भाजपा संगठन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेताओं के कथित ‘वीटो पॉवर’ और उनके समर्थकों को संगठन में महत्वपूर्ण पद दिलाने की रणनीति अब प्रदेश नेतृत्व के लिए चिंता का कारण बनती दिखाई दे रही है। पार्टी से जुड़े सूत्रों और जानकारों के मुताबिक, प्रदेश के करीब 11 जिलों में संगठन की मौजूदा स्थिति को लेकर अंदरूनी स्तर पर आकलन कराया गया है।

इसमें कई जिलों में संगठन की पकड़ कमजोर होने, बूथ स्तर पर सक्रियता घटने और स्थानीय स्तर पर नेताओं की स्वीकार्यता कम होने की बात सामने आने का दावा किया जा रहा है। दतिया में सामने आए घटनाक्रम के बाद प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने दूसरे जिलों में भी संगठन की वास्तविक स्थिति को समझने की कवायद तेज की है।

पार्टी के अंदरूनी आकलन में यह बात सामने आने की चर्चा है कि जिन जिलों में प्रभावशाली नेताओं की पसंद के पदाधिकारी संगठन की कमान संभाल रहे हैं, वहां कई जगह संगठनात्मक गतिविधियां अपेक्षित स्तर पर नहीं हैं। बूथ इकाइयों की सक्रियता से लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय तक को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

भाजपा के भीतर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि जिलाध्यक्षों और संगठन के अन्य महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों में कुछ वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव निर्णायक रहता है। पार्टी के जानकारों का कहना है कि कई बार स्थानीय संगठन और कार्यकर्ताओं की पसंद के बजाय प्रभावशाली नेताओं की पसंद को प्राथमिकता मिल जाती है।

पार्टी के निर्धारित मानकों के मुताबिक जिलाध्यक्ष पद के लिए संगठन में पर्याप्त अनुभव और सक्रिय भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बावजूद कुछ जिलों में ऐसे नेताओं को जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा है, जिनका संगठनात्मक अनुभव अपेक्षाकृत कम रहा है। पार्टी के अंदर इसे वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव का परिणाम माना जा रहा है।

आरोप यह भी है कि ऐसे जिलाध्यक्ष कई मामलों में संगठनात्मक निर्णयों से ज्यादा अपने राजनीतिक संरक्षकों की राय को महत्व देते हैं। इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा होने और संगठन की स्वतंत्र कार्यप्रणाली प्रभावित होने की स्थिति बनती है। दतिया का हालिया घटनाक्रम इसी अंतर्विरोध का उदाहरण माना जा रहा है।

संगठन की जमीन खिसकी तो चुनावी चिंता बढ़ी

भाजपा नेतृत्व की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि अगले वर्ष प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनावों की तैयारियां शुरू होनी हैं। पार्टी के रणनीतिकारों को आशंका है कि यदि संगठनात्मक स्तर पर समय रहते कमियों को दूर नहीं किया गया तो इसका सीधा असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है। पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि निकाय चुनाव स्थानीय संगठन की ताकत का बड़ा परीक्षण होंगे।

यदि बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता और जनता के साथ संवाद कमजोर रहा तो इसका असर आगे होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि प्रदेश नेतृत्व अब केवल जिलाध्यक्षों की रिपोर्ट के बजाय जमीनी स्तर की वास्तविक स्थिति जानने पर जोर दे रहा है। सूत्रों के अनुसार, बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की भागीदारी, स्थानीय नेताओं की स्वीकार्यता और आम लोगों के बीच पार्टी की स्थिति जैसे बिंदुओं को आकलन में शामिल किया गया है।

‘पॉवर’ पर लग सकता है ब्रेक

पार्टी के भीतर चल रही इस कवायद का अगला असर उन नेताओं पर पड़ सकता है, जिनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में संगठन की स्थिति कमजोर पाई गई है। जानकारों के मुताबिक, प्रदेश नेतृत्व ऐसे नेताओं की संगठनात्मक भूमिका को सीमित करने की रणनीति पर विचार कर सकता है। भविष्य में उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों से जुड़े महत्वपूर्ण संगठनात्मक मामलों में उन्हें निर्णायक भूमिका देने के बजाय प्रदेश स्तर से फैसले लेने की व्यवस्था मजबूत की जा सकती है। हालांकि, इस संबंध में पार्टी की ओर से अभी कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है।

11 जिलों में अध्यक्ष बदले जाने की चर्चा

भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, संगठनात्मक समीक्षा के बाद करीब 11 जिलों में जिलाध्यक्षों को बदले जाने की संभावना पर चर्चा चल रही है। इनमें सिवनी, नर्मदापुरम, टीकमगढ़, उमरिया, रायसेन और खरगोन सहित अन्य जिले शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि, संभावित बदलाव को लेकर अंतिम निर्णय पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होने की संभावना है। पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि जिन जिलों में वर्तमान नेतृत्व अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहा है, वहां विधानसभा चुनाव के दौरान सक्रिय रहे और संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले कार्यकर्ताओं को आगे लाया जा सकता है।

महिला जिलाध्यक्षों को प्रदेश की जिम्मेदारी, नए चेहरों को मौका?

संगठनात्मक फेरबदल में एक और संभावित रणनीति पर चर्चा है। पार्टी के जानकारों के मुताबिक, कुछ जिलों में जिम्मेदारी संभाल रही महिला पदाधिकारियों को प्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका दी जा सकती है। ऐसी स्थिति में संबंधित जिलों में नए चेहरों को मौका मिल सकता है। पार्टी की रणनीति ऐसे कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने की बताई जा रही है, जिन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक सक्रिय भूमिका निभाई थी। संगठन में इसे संभावित ‘डैमेज कंट्रोल’ की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।

किसानों के बीच छवि सुधारने सहकारिता चुनाव पर फोकस

संगठनात्मक कमजोरी के साथ भाजपा किसानों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ को लेकर भी रणनीति बदलने की तैयारी में है। पार्टी सहकारिता के माध्यम से ग्रामीण और किसान क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। पार्टी के जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में किसानों से जुड़े विभिन्न संगठनों की सक्रियता और सरकार के समक्ष उठाए गए मुद्दों से ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी की छवि प्रभावित हुई है। ऐसे में सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करना भाजपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

इसी कड़ी में पार्टी ने सोमवार को सहकारिता प्रकोष्ठ की कोर टीम का ऐलान किया। इसमें सहकारिता मंत्री विश्वास कैलाश सारंग, आनंद विभाग के मंत्री लखन पटेल, सांसद शिवमंगल सिंह तोमर, विधायक रमाकांत भार्गव, अपेक्स बैंक के प्रशासक महेंद्र सिंह यादव, पूर्व राज्यसभा सांसद कैलाश सोनी, नेशनल लेबर को-ऑपरेटिव फेडरेशन के संचालक विवेक चतुर्वेदी और सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक किशन सिंह भटोल को शामिल किया गया है।

सहकारिता चुनाव के जरिए ग्रामीण नेटवर्क मजबूत करने की तैयारी

भाजपा के रणनीतिकार सहकारिता चुनावों को केवल संस्थागत चुनाव नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन के नेटवर्क को मजबूत करने के अवसर के तौर पर देख रहे हैं। यदि सहकारी संस्थाओं में पार्टी समर्थित कार्यकर्ताओं की मजबूत मौजूदगी बनती है तो इसका फायदा पंचायत से लेकर विधानसभा चुनाव तक संगठन को मिल सकता है। यही कारण है कि सहकारिता प्रकोष्ठ को सक्रिय करने के साथ पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों में नए सिरे से संगठनात्मक संपर्क बढ़ाने की तैयारी कर रही है।

अब संगठन में ‘परफॉर्मेंस’ होगी पैमाना

प्रदेश भाजपा के सामने मौजूदा चुनौती केवल जिलाध्यक्ष बदलने की नहीं है, बल्कि संगठन में प्रभावशाली नेताओं की भूमिका और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन बनाने की भी है। पार्टी यदि संगठन की कमजोर कडिय़ों को समय रहते पहचानकर बदलाव करती है तो आगामी निकाय चुनाव से पहले उसे अपनी स्थिति सुधारने का मौका मिल सकता है।

वहीं, अंदरूनी सर्वे में सामने आई कथित कमजोर स्थिति को नजरअंदाज किया गया तो स्थानीय असंतोष और गुटबाजी का असर चुनावी मैदान में दिखाई दे सकता है। ऐसे में प्रदेश नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि संगठन में किसका प्रभाव चले—व्यक्तिगत राजनीतिक ताकत का या बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता के प्रदर्शन का।



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