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जन्मदिन को केक ने बना दिया बच्चों की यादों का हिस्सा

नई दिल्ली। जन्मदिन पर अब केक सिर्फ स्वाद के लिए नहीं चुना जाता, बल्कि यह बच्चे की पसंद, उम्र और व्यक्तित्व को भी दर्शाता है। यही वजह है कि बच्चों के जन्मदिन के लिए केक के डिजाइन और थीम को लेकर माता-पिता काफी सोच-विचार करने लगे हैं। कुछ समय पहले तक जन्मदिन पर साधारण स्पंज केक, क्रीम और मोमबत्तियां ही काफी मानी जाती थीं।

लेकिन सोशल मीडिया, बेकरी संस्कृति और जन्मदिन की तस्वीरों को यादगार बनाने की बढ़ती चाह ने केक को उत्सव का खास आकर्षण बना दिया है। डायनासोर के आकार का केक किसी छोटे बच्चे की पसंद को दर्शाता है, तो पेस्टल रंगों और सितारों से सजा केक उसकी पार्टी की थीम के अनुरूप हो सकता है। इस तरह केक बच्चे के उस दौर की पसंद को भी यादों में सुरक्षित कर देता है। पहला जन्मदिन इन सबसे अलग होता है। 

इस उम्र में बच्चे को शायद ही अपने जन्मदिन की कोई याद रहे, लेकिन माता-पिता के लिए यह पूरे एक साल की यात्रा पूरी होने का खास मौका होता है। पहले जन्मदिन के केक में आमतौर पर हल्के रंग, टेडी बियर, बादल, जंगल के जानवर या ‘वन’ जैसे डिजाइन पसंद किए जाते हैं। कई माता-पिता केक स्मैश के लिए अलग छोटा केक और मेहमानों के लिए खाने वाला दूसरा केक भी रखते हैं। स्वाद में वनीला और चॉकलेट जैसे विकल्प लोकप्रिय हैं, जबकि अब फलों वाले केक भी पसंद किए जाने लगे हैं। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनके केक भी उनकी रुचियों के अनुरूप बदलने लगते हैं। 

खेल पसंद करने वाले बच्चों के लिए क्रिकेट या फुटबॉल थीम वाला केक, प्रकृति और जानवरों में रुचि रखने वाले बच्चों के लिए जंगल या वन्यजीव थीम और रंग पसंद करने वाले बच्चों के लिए चमकीले रंगों वाला केक चुना जा सकता है। किताबें पसंद करने वाले बच्चे के लिए खुली किताब के आकार का केक भी आकर्षक विकल्प हो सकता है।

तीन से दस वर्ष की उम्र के बच्चों में कार्टून और पसंदीदा पात्रों का आकर्षण काफी अधिक होता है। सुपरहीरो, राजकुमारियां, डायनासोर और वीडियो गेम के पात्रों पर आधारित केक खूब पसंद किए जाते हैं। आधुनिक बेकरी में फोंडेंट, खाद्य प्रिंटिंग और हाथ से बनाई गई सजावट के जरिए ऐसे डिजाइन तैयार किए जाते हैं। आखिरकार, जन्मदिन का केक सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि बच्चे के बचपन की यादों का हिस्सा बन जाता है।




जनता ने जिस सीएम को नकारा है उन्हें वही पसंद है: पूनावाला

-शहजाद का अभिजीत दीपके पर पलटवार

नई दिल्ली,। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके द्वारा कुछ मुख्यमंत्रियों को देश के सर्वश्रेष्ठ नेताओं की सूची में शामिल करने पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे शहजाद पूनावाला ने अभिजीत दीपके और उनकी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) पर तीखा हमला बोला है। पूनावाला ने कहा है कि दीपके को जिन मुख्यमंत्रियों को अच्छे लगते हैं, उन्हें जनता पहले ही नकार चुकी है। उन्होंने सीजेपी को फ्रॉड पार्टी करार देते हुए दीपके के चुने गए तीन मुख्यमंत्रियों के चयन पर गंभीर सवाल उठाए।

हाल ही में एक कार्यक्रम में अभिजीत दीपके ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (डीएमके) के नेता एमके स्टालिन और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को देश के सबसे अच्छे मुख्यमंत्रियों में शामिल किया था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शहजाद पूनावाला ने कहा, ये तीनों ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें उनकी जनता ने रिजेक्ट कर दिया है। तो सीजेपी को वो सीएम अच्छे लगते हैं, जिन्हें जनता ने रिजेक्ट कर दिया है।

उन्होंने तंज कसा कि कॉकरोच जनता पार्टी में से जनता को हटाकर सिर्फ कॉकरोच पार्टी कर देना चाहिए, क्योंकि जनता का निर्णय कुछ और रहा है। पूनावाला ने अभिजीत दीपके के दावों का खंडन करते हुए तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था पर एमके स्टालिन के कार्यकाल को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टालिन ने तमिलनाडु की नहीं, बल्कि अपने परिवार की अर्थव्यवस्था और अपने बेटे का उदय किया।

आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि स्टालिन के पांच सालों के कार्यकाल में तमिलनाडु का कर्ज 2021 में 4.86 लाख करोड़ से बढ़कर 9.52 लाख करोड़ हो गया था। पूनावाला ने टिप्पणी की, जितना 60-70 सालों में बढ़ा, उतना पांच सालों में स्टालिन ने बढ़ाया। ये अच्छा कर रहे थे इकोनॉमी को।

केरल के पूर्व सीएम पिनराई विजयन के स्वास्थ्य मॉडल की तारीफ पर भी पूनावाला ने आपत्ति जताई। उन्होंने कोविड की दूसरी लहर का जिक्र करते हुए कहा कि केरल की आबादी साढ़े तीन करोड़ थी, और आंकड़ों के अनुसार वहां 71 हजार मौतें हुईं। इसकी तुलना में, उत्तर प्रदेश की आबादी 24 करोड़ थी और वहां कोविड से जुड़ी मौतें 23 हजार 700 हुईं थीं। पूनावाला ने इसे कुप्रबंधन बताते हुए कहा, छोटा राज्य होने के बावजूद केरल में यूपी से ज्यादा मौतें हुईं। ये था केरल हेल्थ मॉडल।



पीएम मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना से कहीं थीं कई बातें

-पूर्व सीडीएस ने किया खुलासा

नई दिल्ली । भारत के पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद के हालात पर हुई एक चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण खुलासे किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान की किराना हिल्स को निशाना नहीं बनाया था, जहां कथित तौर पर परमाणु प्रतिष्ठान होने की बात कही जाती है।

जनरल चौहान ने बताया कि वास्तव में, सरगोधा की ओर कई आत्मघाती ड्रोन भेजे गए थे, और संभव है कि उनमें से एक अपनी उड़ान क्षमता खोने के बाद नीचे गिरकर किराना हिल्स में किसी पहाड़ी से टकरा गया हो। जनरल चौहान ने यह भी बताया कि 22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमले के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 29 अप्रैल को एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी।

इस बैठक में यह तय किया गया था कि भारत सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और पाकिस्तान को एक बड़ा सबक सिखाना चाहिए, जिसके लिए अकल्पनीय कदम उठाने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने सेना को निर्देश दिया था कि इसे अपने समय पर करें, लेकिन यह सुनिश्चित करें कि विफलता की कोई गुंजाइश न हो और हमारे पास सबूत होने चाहिए।

इस महत्वपूर्ण बैठक में रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और तीनों सेनाओं के प्रमुख भी मौजूद थे। ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े अहम फैसले यहीं लिए गए। जनरल चौहान ने बताया कि रक्षा मंत्री के विशेष आग्रह पर बहावलपुर के लक्ष्य को सूची में शामिल किया गया था, क्योंकि प्रधानमंत्री ने कुछ बड़ा करने की बात कही थी।

आम नागरिकों को कम से कम नुकसान हो, यह सुनिश्चित करने के लिए हमले के लिए रात का समय चुना गया। यह पहली बार है जब जनरल चौहान ने उस बैठक में लिए गए इन गोपनीय फैसलों की जानकारी सार्वजनिक की है। जनरल चौहान (सेवानिवृत्त) ने बताया कि 23 से 29 अप्रैल के बीच कई उच्च-स्तरीय बैठकें हुईं, जिनमें सरकार के पास कई विकल्प चर्चा के लिए रखे गए थे।

29 अप्रैल की बैठक में ही बहावलपुर के लक्ष्य को भी सूची में शामिल करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया था, जो मई 2025 में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में नौ आतंकी ठिकानों के खिलाफ चलाए गए सैन्य अभियान से कुछ दिन पहले लिया गया था।



मदर टेरेसा: गरीबों की सांसों में बसने वाली संत


                                             (मदर टेरेसा की 116वीं जयंती (26 अगस्त) पर विशेष)

मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।

18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।

कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’

मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’

 

उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।

उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया।

उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।

मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है।

उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।

                                                                                                                            (लेखक- योगेश कुमार गोयल)

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जन्मदिन को केक ने बना दिया बच्चों की यादों का हिस्सा


                                             (मदर टेरेसा की 116वीं जयंती (26 अगस्त) पर विशेष)

मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।

18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।

कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’

मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’

 

उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।

उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया।

उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।

मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है।

उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।

                                                                                                                            (लेखक- योगेश कुमार गोयल)

जनता ने जिस सीएम को नकारा है उन्हें वही पसंद है: पूनावाला


                                             (मदर टेरेसा की 116वीं जयंती (26 अगस्त) पर विशेष)

मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।

18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।

कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’

मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’

 

उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।

उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया।

उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।

मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है।

उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।

                                                                                                                            (लेखक- योगेश कुमार गोयल)

पीएम मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना से कहीं थीं कई बातें


                                             (मदर टेरेसा की 116वीं जयंती (26 अगस्त) पर विशेष)

मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।

18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।

कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’

मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’

 

उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।

उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया।

उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।

मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है।

उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।

                                                                                                                            (लेखक- योगेश कुमार गोयल)

मदर टेरेसा: गरीबों की सांसों में बसने वाली संत


                                             (मदर टेरेसा की 116वीं जयंती (26 अगस्त) पर विशेष)

मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।

18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।

कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’

मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’

 

उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।

उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया।

उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।

मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है।

उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।

                                                                                                                            (लेखक- योगेश कुमार गोयल)

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