अमिताभ बच्चन ने पारंपरिक अंधविश्वासों पर उठाए सवाल
Oct 30, 2026
- कहा- आधुनिक पीढ़ी मानती है केवल वैज्ञानिक तर्क
मुंबई। भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन अक्सर अपने विचारों और अनुभवों को अपने व्यक्तिगत ब्लॉग के माध्यम से प्रशंसकों के साथ साझा करते रहते हैं। अपने एक हालिया ब्लॉग पोस्ट में अमिताभ बच्चन ने समाज में गहराई से रची-बसी पुरानी परंपराओं, मान्यताओं और अंधविश्वासों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अधिकांश लोग बिना किसी तर्क या अर्थ को समझे केवल पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही प्रथाओं का पालन करते आ रहे हैं। अपने इस लेखन में उन्होंने इस बात पर गहराई से प्रकाश डाला कि किस प्रकार समय बीतने के साथ इंसान की व्यक्तिगत इच्छाएं, सोच और जीवन को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल जाता है।
ब्लॉग में अमिताभ बच्चन ने लिखा कि इंसान के जीवन में एक ऐसा पड़ाव भी आता है जब वह उन सभी चीजों को दोबारा करना चाहता है, जिनसे उसे अतीत में रोका गया था। उन्होंने जीवन के बदलते चक्र का वर्णन करते हुए कहा कि एक समय में इंसान पूरी तरह से बेफिक्र होता है और फिर जीवन के उत्तरार्ध में वह दोबारा उसी बेफिक्री को पाना चाहता है। इंसान का दिमाग कई बार अजीब तरह से निर्णय लेता है, लेकिन यह प्रक्रिया इंसान को एक अलग प्रकार का मानसिक सुकून भी प्रदान करती है। परंपराओं पर सवाल उठाते हुए उन्होंने शनिवार को नाखून न काटने जैसी मान्यताओं का उदाहरण दिया। उन्होंने लिखा कि शनिवार को नाखून न काटने को अशुभ माना जाता है और यह प्रथा केवल अज्ञात डर के कारण आज भी समाज में अपनी जगह बनाए हुए है।

इसके साथ ही उन्होंने रत्नों से जुड़े अंधविश्वासों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने लिखा कि लोग कहते हैं कि हरा पत्थर मत पहनो, बल्कि उसकी जगह एक हरे रंग की शॉल अपने पास रख लो। इस पर सवाल उठाते हुए अमिताभ बच्चन ने पूछा कि उस निर्दोष पत्थर ने किसी का क्या बिगाड़ा है और पास में रखी हरी शॉल किसी व्यक्ति के लिए किस प्रकार लाभदायक साबित हो सकती है। इन खोखले तर्कों पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि डर के कारण लोग आज्ञाकारी बनकर इन प्रथाओं को स्वीकार करते रहते हैं।
हालांकि, महानायक ने यह भी स्वीकार किया कि आज की आधुनिक पीढ़ी अंधविश्वासों को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करती है। वर्तमान पीढ़ी किसी भी प्रथा को अपनाने से पहले उसके पीछे के वैज्ञानिक, शारीरिक और मानसिक कारणों को समझती है। आज के युवा केवल उन्हीं परंपराओं और जीवनशैली को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाते हैं, जिनसे उनके स्वास्थ्य, मानसिक शांति और जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार हो सके।