गोविंद के परिवहन मंत्री बनते सौरभ की बल्ले-बल्ले

Dec 24, 2024

भोपाल । मध्यप्रदेश के परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्तियों का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा, जिन्हें 2016 में अनुकंपा नियुक्ति के आधार पर परिवहन विभाग में नौकरी मिली थी, आज करोड़ों की संपत्तियों और रसूखदार नेताओं के साथ सांठगांठ के कारण सुर्खियों में है। सौरभ शर्मा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की एंट्री ने भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के इस हाई प्रोफाइल मामले को और सनसनीखेज बना दिया है। सौरभ शर्मा के फर्जी दस्तावेजों से नौकरी पाने से लेकर करोड़ों की संपत्ति खड़ी करने और रसूखदार नेताओं और अधिकारियों के साथ सांठगांठ तक का यह मामला प्रदेश में गहराई तक फैले भ्रष्टाचार की तस्वीर पेश करता है।

सौरभ के आरक्षक से करोड़पति बनने की कहानी

सौरभ शर्मा को 2016 में परिवहन विभाग में आरक्षक के पद पर अनुकंपा नियुक्ति मिली। यहीं से उस पर नेताओं और अधिकारियों की कृपा बरसने लगी। वह परिवहन विभाग का लाड़ला हो गया था। परिवहन आयुक्त कार्यालय ग्वालियर में लगभग एक वर्ष कार्यरत रहने के बाद सौरभ ने पदस्थापना चेकपोस्ट पर करा ली। इसके बाद 2019 में भोपाल आकर उसने मंत्रियों से नजदीकी बढ़ा ली। उस दौरान गोविंद सिंह राजपूत के तत्कालीन परिवहन मंत्री रहते हुए चेक पोस्टों में जमकर अवैध वसूली की शिकायत आ रही थीं। यहां तक कि उस समय सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी नागपुर के भाजपा नेताओं की शिकायत के आधार पर तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस को अवैध वसूली के संबंध में पत्र लिखा था।  सौरभ शर्मा इस वसूली में एक अहम कड़ी था। 2023 में अपनी नौकरी छोडऩे के बाद भी सौरभ ने  यह नेटवर्क जारी रखा। इस बीच कथित तौर पर तत्कालीन ट्रांसपोर्ट कमिश्नर मधुकुमार का लिफाफा लेते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद गृह विभाग ने उन्हें पद से हटाने का आदेश निकाल दिया था। हालांकि बाद में लोकायुक्तसे क्लीन चिट मिल गई।

सौरभ से संबंधों पर आग बबूला मंत्री

अब राजनीतिक गलियारों में सौरभ से मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की नजदीकी की चर्चा चल रही है। कुछ दिन पहले सौरभ से नजदीकी संबंधों के सवाल पर खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंद सिंह राजपूत मीडियाकर्मियों पर बिफर गए थे। मंत्री राजपूत शनिवार को ग्वालियर पहुंचे तो मीडियाकर्मियों ने उनसे पूछा कि पूर्व में परिवहन मंत्री रहते सौरभ शर्मा को आपका संरक्षण था? इस पर वह गुस्से में बोले- कौन बोला यह? कहा कि प्रदेश में हजारों कर्मचारी काम करते हैं, कौन क्या कर रहा है, क्या पता? यह जांच का विषय है। गौरतलब है कि 19 दिसंबर को लोकायुक्त और आयकर विभाग के छापों में सौरभ शर्मा के ठिकानों से 235 किलो चांदी सहित कुल 8 करोड़ की नकदी और आभूषण मिले हैं। वहीं, आयकर विभाग को भोपाल के मेंडोरी के जंगल में 19 दिसंबर की देर रात एक कार से 52 किलो सोना मिला। 11 करोड़ रुपए कैश भी बरामद हुए। कार एक मकान के बाहर लावारिस हालत में मिली। सोने की कीमत करीब 40 करोड़ 47 लाख रुपए आंकी गई है। कार का मालिक चेतन सिंह गौर सौरभ का करीबी है। सौरभ शर्मा का मामला प्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ों को उजागर करता है। ईडी की जांच से यह साफ हो चुका है कि सौरभ केवल एक मोहरा है। असली खेल उन ताकतवर नेताओं और अधिकारियों का है, जिन्होंने सौरभ जैसे लोगों को भ्रष्टाचार के जरिए ताकतवर बनाया। आने वाले दिनों में ईडी की कार्रवाई से प्रदेश की राजनीति और प्रशासन पर बड़ा असर पड़ सकता है।


मध्यप्रदेश इंटेलिजेंस भी जुटा पड़ताल में

सूत्रों का कहना है कि सौरभ शर्मा की काली कमाई सामने आने के बाद मप्र सरकार ने इंटेलिजेंस के माध्यम से जांच शुरू करा दी है। दरअसल, अभी परिवहन विभाग के और भी अधिकारी टारगेट पर आ गए हैं। बताया जाता है परिवहन विभाग के कई आला अधिकारी और कुछ नेता लगातार सौरभ शर्मा के संपर्क में थे और अपनी काली कमाई उसी के माध्यम से ठिकाने लगा रहे थे। यह रैकेट लंबे समय से सक्रिय था। प्रदेश सरकार पड़ताल करवा रही है कि काली कमाई को कहां-कहां खपाई गई है। इसके अलावा अन्य मामलों की भी पड़ताल सरकार द्वारा कराया जा रहा है।


शिकायत के बीच किसने दिया सौरभ को वीआरएस...

सौरभ शर्मा काली कमाई के साथ ही अपने वीआरएस के लिए भी चर्चा में है। बताया जाता है कि सौरभ शर्मा परिवहन विभाग में था उसी समय उसके खिलाफ शिकायत की गई थी। ऐसे में उसने वीआरएस ले लिया था ताकि वह जांच एजेंसियों से बच सकें। लेकिन सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार की शिकायत होने के बाद भी सौरभ को किसने वीआरएस दिया। सूत्र बताते हैं कि अब इसकी भी जांच शुरू हो गई है। सौरभ शर्मा वीआरएस के बाद परिवहन मंत्री एवं परिवहन आयुक्त के लिए काम करने लगा था। डिपार्टमेंट का पूरा ब्लैक मनी ट्रांजैक्शन सौरभ शर्मा हैंडल करता था। सौरभ शर्मा की नियुक्ति से लेकर उसकी पूरी नौकरी और परिवहन चेक पोस्टों पर नियुक्तियां, उगाही से लेकर पैसों की बंदरबांट का पूरा जिम्मा यह बताता है कि प्रदेश में नेताओं और अधिकारियों के बीच किस कदर गठजोड़ काम कर रहा था। 


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