भारतीय इस्पात क्षेत्र में आई क्रांति, उदारीकरण ने बदली तस्वीर
Aug 10, 2026
- 1991-92 में इस्पात मंत्रालय की रिपोर्ट से शुरू हुआ बदलाव का दौर
नई दिल्ली । भारत के इस्पात क्षेत्र ने 1991-92 में एक नए युग में प्रवेश किया, जब सरकार ने इसे लाइसेंसिंग और मूल्य नियंत्रण से मुक्त कर दिया। इस्पात मंत्रालय की उस वर्ष की रिपोर्ट ने घोषणा की कि इस्पात उत्पादन अब केवल सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, जिसने जुलाई 1991 की नई औद्योगिक नीति के तहत उद्योग को निजी भागीदारी के लिए खोल दिया। इस्पात पहला प्रमुख क्षेत्र था जिसे लाइसेंस की शर्त से मुक्त किया गया।
अब क्षमता बढ़ाने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता समाप्त हो गई, केवल स्थान संबंधी कुछ पाबंदियां रहीं। 1 जनवरी, 1992 से सरकार ने कीमत और वितरण पर भी नियंत्रण खत्म कर दिए, जिससे सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की कंपनियों को सख्त नियम-कायदों से आजादी मिली। इन सुधारों ने विदेशी निवेश के रास्ते खोले और कच्चे माल तथा उपकरणों के आयात संबंधी बाधाएं कम कीं। परिणामस्वरूप, कभी सनसेट इंडस्ट्री कहे जाने वाले इस उद्योग का कायापलट हो गया।
स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभुत्व वाले इस उद्योग की कमान अब निजी कंपनियों के हाथों में आ गई, जिसने अगले तीन दशकों में तीव्र आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दिया। उदारीकरण से पहले 1990-91 में देश के 1.32 करोड़ टन इस्पात उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 46 फीसदी थी, जबकि टाटा स्टील एकमात्र एकीकृत निजी उत्पादक था। अब निजी क्षेत्र का प्रभुत्व स्पष्ट है।