भारतीय मोबाइल इंडस्ट्री के लिए चुनौती बनी सरकार की टैरिफ नीति
Jan 17, 2024
नई दिल्ली । सरकार की टैरिफ नीति भारतीय मोबाइल इंडस्ट्री के लिए चुनौती बन रही है। इसमें एप्पल का दबदबा भी सामने आ रहा है। दरअसल यही वजह है कि एक समय तेजी से बढ़ रहा भारतीय मोबाइल फोन बाजार अब मंदी का सामना कर रहा है। वित्त वर्ष 2024 में बिक्री वित्त वर्ष 2023 के समान 33 बिलियन रहने की उम्मीद है। 1.4 अरब की आबादी में 1,150 मिलियन फोन के साथ, मोबाइल की पहुंच 83 प्रतिशत से अधिक है। ग्रोथ रेट, जो वित्त वर्ष 2015 से वित्त वर्ष 19 तक 21 प्रतिशत थी, वित्त वर्ष 2020 से वित्त वर्ष 23 तक गिरकर 4.8 प्रतिशत हो गई है और वित्त वर्ष 24 से वित्त वर्ष 27 तक 3.8 प्रतिशत होने का अनुमान है। मोबाइल उत्पादन के लिए मैटी के बड़े लक्ष्य थे, जिसमें वित्त वर्ष 26 तक 126 बिलियन का लक्ष्य था, जिसमें निर्यात का एक बड़ा हिस्सा शामिल था।
लेकिन अब उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) स्कीम के प्रभाव के बावजूद, इन लक्ष्यों को पूरा करने को लेकर अनिश्चितताएं हैं। बता दें कि पीएलआई स्कीम के कारण निर्यात बेहतर हो रहा है, लेकिन चिंता है कि भारतीय मोबाइल निर्माता चीन और वियतनाम से कितना मुकाबला कर पाएंगे। कंपोनेंट पर हाई आयात शुल्क भारत को कम प्रतिस्पर्धी बनाते हैं।
इंडियन सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (आईसीईए) का कहना है कि इन टैरिफ में कटौती से वित्त वर्ष 2027 तक निर्यात 50 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। वहीं एप्पल मोबाइल निर्यात में एक बड़ा प्लेयर है, अप्रैल-दिसंबर 2023 में 66 प्रतिशत रहा है। ऐसे में सैमसंग जैसी अन्य कंपनियों और स्थानीय कंपनियों को निर्यात में अपना शेयर बढ़ाने की जरूरत बताई जा रही है। इसके लिए वित्त मंत्रालय को यह पता लगाना होगा कि कम टैरिफ के साथ दोनों वैश्विक कंपनियों को कैसे खुश किया जाए और टैरिफ के साथ स्थानीय व्यवसायों का समर्थन कैसे किया जाए। क्योंकि स्थानीय स्मार्टफोन बाजार मैच्योर है, जिसमें लगभग 800 मिलियन स्मार्टफोन और 300-350 मिलियन फीचर फोन हैं। वित्त वर्ष 2020 में स्मार्टफोन की बिक्री 200 मिलियन से घटकर 150-160 मिलियन हो गई, और लोग अब अपने फोन को 2-3 साल तक चलाते हैं क्योंकि वे स्तरीय तकनीक से लैस और महंगे हैं।